लोकसभा में कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर द्वारा पेश किया गया स्थगन प्रस्ताव औपचारिक संसदीय प्रक्रिया भर नहीं है। यह उस बेचैनी का राजनीतिक रूप है, जो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सामने आए जेफ़्री एप्स्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों के बाद स्वाभाविक रूप से पैदा हुई है। कांग्रेस की मांग है सीधी कि जब अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ों और ईमेल्स में प्रधानमंत्री का नाम, उनके कथित प्रतिनिधि और भारत की चुनावी व कूटनीतिक रणनीतियों का ज़िक्र आता है, तो संसद में उस पर चर्चा क्यों न हो? सरकार की चुप्पी और चर्चा से बचने की कोशिश इस सवाल को और गहरा करती है।
आरोप नहीं, लेकिन गंभीर संकेत
यह साफ़ करना ज़रूरी है कि अब तक उपलब्ध दस्तावेज़ों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसी प्रत्यक्ष, प्रमाणित या आधिकारिक संपर्क का ठोस सबूत सामने नहीं आया है। खुद विदेश मंत्रालय ने भी एप्स्टीन के दावों को “एक दोषसिद्ध अपराधी की कल्पनाएं” बताते हुए खारिज किया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन पत्रकारिता और लोकतंत्र केवल “अपराध सिद्ध हुआ या नहीं” तक सीमित नहीं होते। यहाँ सवाल यह है कि एप्स्टीन जैसे कुख्यात व्यक्ति को भारतीय सत्ता और बड़े कारोबारी तंत्र तक पहुँच का आत्मविश्वास और भारत के प्रधानमंत्री के नाम का इस्तेमाल करने की हिम्मत आख़िर मिली कैसे? यही वह बिंदु है जहाँ यह मामला सार्वजनिक महत्व का बन जाता है।
अनिल अंबानी, सत्ता और ‘ट्रैक-2 कूटनीति’
दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट है कि जेफ़्री एप्स्टीन और अनिल अंबानी के बीच संबंध महज़ औपचारिक नहीं थे। ईमेल्स और संदेशों में व्हाइट हाउस तक पहुँच, स्टीव बैनन और जैरेड कुशनर से मुलाकात, रक्षा सहयोग, भारत–पाकिस्तान, चीन विरोध और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की जानकारी जैसे विषयों पर बातचीत दर्ज है। यह अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि क्या एक निजी कारोबारी, एक विदेशी बिचौलिए के ज़रिये भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर ‘गाइडेंस’ ले रहा था? अगर हाँ, तो यह लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। अगर नहीं, तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि एप्स्टीन का यह दावा पूरी तरह झूठा क्यों और कैसे है।
सबसे संवेदनशील पंक्ति
पूरे प्रकरण का सबसे विवादास्पद और संवेदनशील हिस्सा वह संदेश है जिसमें एप्स्टीन ने लिखा—“Modi sending someone to see me.” यही वह वाक्य है जिसने इस मुद्दे को संसद तक पहुँचा दिया। अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि वह व्यक्ति कौन था? क्या वह वास्तव में प्रधानमंत्री का प्रतिनिधि था, या यह एप्स्टीन की आत्म-प्रचार वाली भाषा थी, लेकिन जब ऐसा दावा सार्वजनिक दस्तावेज़ों में दर्ज हो, तो उसे नज़रअंदाज़ करना संवैधानिक जवाबदेही से भागना माना जाएगा।
एप्स्टीन का आपराधिक अतीत और सत्ता की नैतिकता
यह भी उतना ही अहम है कि जिस व्यक्ति के दावों पर यह पूरा विवाद खड़ा है, वह नाबालिगों की यौन तस्करी का दोषसिद्ध अपराधी था, जिसके खिलाफ़ 2017–18 तक गंभीर सबूत सामने आ चुके थे, ऐसे व्यक्ति से किसी भी स्तर पर संवाद, संपर्क या “मध्यस्थता” का विचार ही नैतिक रूप से चौंकाने वाला है। यही कारण है कि विपक्ष कह रहा है सवाल मोदी की दोषसिद्धि का नहीं, सवाल सत्ता की नैतिक दूरी का है।
संसद में चर्चा से डर क्यों?
स्थगन प्रस्ताव का मकसद किसी को सज़ा दिलाना नहीं, बल्कि सरकार से स्पष्टीकरण लेना होता है। अगर सरकार के पास छुपाने को कुछ नहीं है, तो संसद में चर्चा से परहेज़ क्यों? चर्चा रोकना, हंगामा कराना या कार्यवाही स्थगित करना, ये सब कदम उस धारणा को मज़बूत करते हैं कि कुछ असहज सवालों से जानबूझकर बचा जा रहा है। लोकतंत्र में संदेह का इलाज बहस है, चुप्पी नहीं एप्स्टीन फाइल्स में प्रधानमंत्री का कथित उल्लेख अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करता।
लेकिन यह लोकतंत्र में स्पष्टीकरण की माँग को पूरी तरह जायज़ बना देता है। अगर संसद में ऐसे मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी, अगर अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ों को “कल्पना” कहकर टाल दिया जाएगा, और अगर सत्ता–कारोबार–विदेशी बिचौलियों के रिश्तों पर सवाल पूछने वालों को देशद्रोही ठहराया जाएगा तो असली नुकसान किसी नेता का नहीं, भारत की लोकतांत्रिक पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता का होगा। आज सवाल यह नहीं है कि एप्स्टीन क्या कहता था। असल सवाल यह है कि भारत का लोकतंत्र ऐसे सवालों का सामना करने का साहस रखता है या नहीं।