दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में 14 फरवरी 2026 को आयोजित कार्यक्रम में विश्व हिंदू परिषद (इंद्रप्रस्थ) के पूर्व अध्यक्ष की पुस्तक के विमोचन के दौरान दिए गए भाषणों ने एक बार फिर धार्मिक पहचान, इतिहास और सामाजिक प्रथाओं पर बहस को तेज कर दिया। कार्यक्रम में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने ‘घर वापसी’ को वैचारिक संघर्ष बताते हुए इसे संगठित रूप से आगे बढ़ाने की बात कही। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
उसका एक प्रमुख तर्क यह था कि मध्यकालीन दौर में हिंदू महिलाओं की सुरक्षा के लिए बाल विवाह, पर्दा प्रथा और रात्रि विवाह जैसी सामाजिक व्यवस्थाएं विकसित हुईं। यानी एक सामाजिक कुरीति को ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में ‘रक्षा-व्यवस्था’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। यहीं से असली प्रश्न जन्म लेता है।
एक ही प्रथा, दो पैमाने?
यदि किसी समाज में ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण बाल विवाह को ‘सुरक्षा उपाय’ मान लिया जाए, तो वही ऐतिहासिक तर्क किसी अन्य सभ्यता पर लागू क्यों नहीं होता? भाषण में इस्लामी इतिहास के कुछ प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कम उम्र के विवाह को आज के संदर्भ में अस्वीकार्य बताया गया।
आधुनिक कानूनों और नैतिकता का हवाला दिया गया—जो अपने आप में उचित तर्क है। लेकिन प्रश्न यह है कि: जब हिंदू समाज के अतीत को ऐतिहासिक संदर्भ देकर समझा जा सकता है तो इस्लामी इतिहास को उसी ऐतिहासिक संदर्भ में क्यों नहीं देखा जाता? इतिहास का मूल सिद्धांत यही है कि सामाजिक प्रथाएं अपने समय की परिस्थितियों से बनती हैं, न कि आज की नैतिकता से। यदि किसी प्रथा को आज गलत कहा जाता है, तो उसका मूल्यांकन सार्वभौमिक होना चाहिए, न कि धर्म-विशेष के आधार पर।
इतिहास बनाम राजनीति
‘घर वापसी’ को वैचारिक युद्ध बताने वाला दृष्टिकोण मूलतः धार्मिक पहचान की राजनीतिक परिभाषा को मजबूत करता है। यह विमर्श सामाजिक सुधार या मानवाधिकार के प्रश्न से अधिक पहचान की राजनीति के रूप में सामने आता है। जब एक ओर मध्यकालीन हिंदू समाज की प्रथाओं को सुरक्षा-तंत्र बताया जाता है, और दूसरी ओर इस्लामी इतिहास के उदाहरणों को आधुनिक नैतिकता के कसौटी पर कठोरता से परखा जाता है, तो यह बहस इतिहास की नहीं बल्कि चयनात्मक व्याख्या की बन जाती है।
इतिहासकारों का व्यापक मत रहा है कि बाल विवाह जैसी प्रथाएं विभिन्न सभ्यताओं में अलग-अलग कारणों से विकसित हुईं। सुरक्षा, सामाजिक संरचना, जीवन प्रत्याशा और आर्थिक व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों के कारण। इसलिए यह प्रश्न सिर्फ धर्म का नहीं, बल्कि इतिहास की निष्पक्ष समझ का है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी
कार्यक्रम में 2022 के विवाद का उल्लेख करते हुए नूपुर शर्मा के समर्थन की बात भी कही गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक विमर्श समाज को विभाजित करने के बजाय समझ की दिशा में बढ़े। किसी भी धर्म, परंपरा या इतिहास पर प्रश्न उठाना वैध है, लेकिन वही सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
असली सवाल
आज भारत में बाल विवाह कानूनन अपराध है, चाहे वह किसी भी धर्म में हो। इसलिए असली बहस यह होनी चाहिए कि क्या हम इतिहास को समान मानदंड से देख रहे हैं? क्या सामाजिक सुधार को धर्म-आधारित बहस बना दिया गया है? क्या अतीत की व्याख्या वर्तमान की राजनीति तय कर रही है? यदि बाल विवाह गलत है, तो वह हर समाज में गलत है। यदि इतिहास को संदर्भ में समझना चाहिए, तो वह हर इतिहास पर लागू होना चाहिए। यही समानता का सिद्धांत लोकतांत्रिक विमर्श की बुनियाद है।