सीरिया की ज़मीन पर एक बार फिर बम बरसे हैं। लेकिन इस बार झंडा ब्रिटेन और फ़्रांस का है, और बहाना वही पुराना
आईएस। ब्रिटेन का रक्षा मंत्रालय बड़े इत्मीनान से बताता है कि रॉयल एयर फ़ोर्स के टाइफून जेट्स ने फ़्रांसीसी
विमानों के साथ मिलकर आईएस के “अंडरग्राउंड हथियार ठिकाने” को तबाह कर दिया। दावा है कि सब कुछ सटीक
था, नागरिक सुरक्षित रहे और मिशन “सफल” रहा। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि बम कितने सटीक थे।
असली सवाल यह है कि सीरिया पर बम गिराने का लाइसेंस इन्हें किसने दिया?
आईएस का नाम लो तो सब माफ़ ?:
जैसे ही आईएस का नाम लिया जाता है,
अंतरराष्ट्रीय क़ानून अचानक गायब हो जाता है। संप्रभुता एक बेकार शब्द बन जाती है। और पश्चिमी जेट्स को खुली
छूट मिल जाती है। क्या सीरिया की ज़मीन पर बम बरसाने से पहले संयुक्त राष्ट्र से अनुमति ली गई? क्या इसमें
सीरियाई सरकार की सहमति थी? या फिर यह वही पुराना फ़ॉर्मूला है की, हम तय करेंगे, हम मारेंगे, और हम ही
सफ़ाई देंगे?
ख़ुफ़िया जानकारी
ब्रिटेन कहता है कि हमें ख़ुफ़िया सूचना मिली थी।
यही तीन शब्द दुनिया को कितनी बार तबाही में झोंक चुके हैं? इराक़ में भी “ख़ुफ़िया जानकारी” थी। लीबिया में भी
“ख़ुफ़िया जानकारी” ही थी। यहाँ तक के अफ़ग़ानिस्तान में भी “ख़ुफ़िया ही जानकारी” थी। नतीजा? देश तबाह हुए,
समाज बिखर गए, और आज तक कोई माफ़ी नहीं। तो सवाल उठाना ज़रूरी है। इस बार कौन जवाबदेह होगा, अगर
यह दावा भी कल को झूठा निकला?
सबसे घिसा-पिटा जुमला- ‘कोई नागरिक हताहत नहीं
ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय पूरे भरोसे से कहता है कि इस हमले में
किसी नागरिक को नुक़सान नहीं हुआ। यह वाक्य अब बयान नहीं, बल्कि एक रस्म बन चुका है। हर बमबारी के बाद
यही कहा जाता है। और फिर महीनों बाद किसी रिपोर्ट में लाशें गिनी जाती हैं, जिन्हें कभी बयान में जगह नहीं मिली।
क्या युद्ध अब इतना “साफ़” हो गया है कि बम सिर्फ़ दीवारों को मारते हैं, इंसानों को नहीं?
आईएस को पैदा किसने किया था?
यह सवाल पश्चिम जानबूझकर भूल जाता है।
कि आईएस किसी रेगिस्तान से नहीं उभरा था बल्कि यह उसी अराजकता की पैदाइश था, जो पश्चिमी हस्तक्षेपों ने
इराक़ और सीरिया में पैदा की है। पहले देश तोड़ो, फिर आतंक पैदा होने पर उसी देश पर दोबारा बम गिराओ।
यह आतंक के ख़िलाफ़ जंग नहीं, यह अंतहीन युद्ध का कारोबार है।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें, ज़मीन पर बारूद
ब्रिटेन के रक्षा मंत्री जॉन हिली ने इस हमले की तस्वीरें सोशल मीडिया
पर साझा कर सैनिकों को बधाई दी है। जैसे यह कोई खेल हो, कोई उपलब्धि हो। लेकिन तस्वीरों में वह डर नहीं
दिखता जो बम से पहले आता है, वह मलबा नहीं दिखता जो बम के बाद बचता है। युद्ध अब कैमरे के लिए लड़ा जा
रहा है, और जनता को तालियाँ बजाने के लिए कहा जा रहा है।
दोहरा मापदंड सबसे बड़ा ख़तरा
आईएस एक ख़तरा है, लेकिन उससे भी बड़ा ख़तरा वह सोच है, जो कुछ देशों को यह
अधिकार देती है कि वे दूसरों की ज़मीन पर जब चाहे बम गिरा सकें। अगर आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग का मतलब
संप्रभुता रौंदना है, क़ानून तोड़ना है और जवाबदेही से भी बचना है, तो यह जंग कभी ख़त्म नहीं होगी। आज सीरिया है,
कल कोई और होगा। और तब भी बयान वही रहेगा कि कोई नागरिक हताहत नहीं हुआ है।
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