लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका जाना, संसदीय इतिहास में एक असहज और चिंताजनक अध्याय जोड़ता है। स्वयं राहुल गांधी ने इसे “अभूतपूर्व” और “लोकतंत्र पर धब्बा” कहा है और यह अतिशयोक्ति नहीं लगती। राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार की नीतियों, प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय सरोकारों का आधिकारिक दस्तावेज़ होता है। उस पर बहस करना संसद का मूल कार्य है, और उस बहस में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका केंद्रीय होती है। ऐसे में, यदि उसी नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका जाए, तो सवाल स्वाभाविक है। संसद चल रही है या सिर्फ़ सत्ता का मंच सजाया जा रहा है? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
नियम 349 या राजनीतिक ढाल?
राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण पुस्तक से जुड़े तथ्यों का उल्लेख करने की कोशिश की। उन्होंने दस्तावेज़ को प्रमाणित करने और ज़िम्मेदारी लेने की परंपरा का हवाला भी दिया जो दशकों से संसद में मान्य रही है। लेकिन सत्ता पक्ष के हंगामे और अध्यक्ष की रोक ने यह संकेत दिया कि नियम अब प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किए जाने वाले औज़ार बनते जा रहे हैं। एक दिन नियम 349, अगले दिन अध्यक्ष की “आपत्ति”, और फिर विपक्षी सांसदों का निलंबन, यह पूरा क्रम बहस रोकने की रणनीति जैसा अधिक लगता है, न कि संसदीय अनुशासन जैसा।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस से डर क्यों?
राहुल गांधी का यह कहना गंभीर है कि उन्हें जानबूझकर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बोलने से रोका जा रहा है। अगर सरकार अपने ही राष्ट्रपति के अभिभाषण में कही गई बातों पर चर्चा से असहज है, तो यह मजबूती नहीं, असुरक्षा का संकेत है। लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल उठाना देशद्रोह नहीं होता बल्कि जवाबदेही का हिस्सा होता है। लेकिन आज की संसद में ऐसा माहौल बन चुका है कि सवाल पूछना हंगामा और जवाब देना राष्ट्रविरोध घोषित कर दिया जाता है।
जब सांसद सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिक का क्या?
यह सवाल अब टालना मुश्किल हो गया है। अगर देश का नेता प्रतिपक्ष, जो लाखों मतदाताओं की आवाज़ है को अगर संसद के भीतर बोलने से रोका जा सकता है, तो फिर आम नागरिक की असहमति का क्या मूल्य है? पत्रकार के सवाल की क्या हैसियत है? छात्र, किसान या मज़दूर की आवाज़ कहाँ सुनी जाएगी? संसद लोकतंत्र की सबसे ऊँची संस्था है। अगर वहीं बहस दबाई जाएगी, तो सड़कों पर उठने वाली आवाज़ों के लिए लाठी, गिरफ़्तारी और मुक़दमे ही बचेंगे, यह संदेश साफ़ है।
अध्यक्ष की भूमिका और संस्थाओं की कसौटी
लोकसभा अध्यक्ष का पद सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन का होता है। वह सरकार का नहीं, सदन का संरक्षक होता है। राहुल गांधी का आरोप कि “सरकार के कहने पर” उन्हें रोका गया, यदि यह धारणा भी बनती है, तो यह संस्था की साख के लिए ख़तरनाक है। संस्थाएँ तब नहीं टूटतीं जब उन पर हमला होता है, संस्थाएँ तब कमज़ोर पड़ती हैं जब वे चुपचाप झुक जाती हैं।
लोकतंत्र का असली संकट
यह मामला सिर्फ़ राहुल गांधी बनाम भाजपा नहीं है। यह सवाल है कि क्या संसद बहस की जगह रह गई है? या वह सिर्फ़ बहुमत के शोर का अखाड़ा बनती जा रही है? जब सत्ता विपक्ष को सुनने से इनकार करती है, तो लोकतंत्र औपचारिक रूप से ज़िंदा रहता है, लेकिन आत्मा से खोखला हो जाता है। आज अगर एक सांसद को रोका जा सकता है, तो कल पूरे समाज को ख़ामोश करना और आसान हो जाएगा। और तब सवाल यह नहीं रहेगा कि राहुल गांधी क्या बोल पाए बल्कि सवाल यह होगा कि इस देश में लोकतंत्र सच में बोल पा रहा है या नहीं।